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प्राचार्य, केन्द्रीय विद्यालय रायसेन

सृष्टि का बाह्य विकास प्रकृति के आंतरिक विकास-प्रक्रिया का प्रतिबिम्ब मात्र है ।

प्रकृति के आंतरिक विकास-प्रक्रिया को जब विद्यार्थी अपने अभ्यंतर की विकास-प्रक्रिया से साहचर्यीकृत कर पाते हैं, तब ही उनमें वैज्ञानिक चेतना का जन्म होता है, आत्म का विस्तार होता है, संकीर्णतायें छूटती हैं और तब ही वे अपने परिवेश को तार्किक दृष्टि से विश्लेषित कर पाने में सक्षम होते हैं ; और शिक्षा का सामान्य उद्देश्य भी तो यही है । पंडित नेहरू लिखते हैं- शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य मन को मुक्त करना है न कि उसे बंधे हुये चौखटों से बांधे रखना ।

उत्तर-आधुनिक इस दौर में जहाँ विखंडन के सिद्धान्त व भाषायी संकेतों की स्थापनाओं के द्वारा वस्तु  व विचार की परंपरा हासिए में धकेल दिये गए हैं और हमारे विद्यार्थी अमूर्तताओं के होकर रह गए हैं । ऐसे में केन्द्रीय विद्यालय संगठन में शिक्षाविदों द्वारा छात्रों के बहुमुखी विकास को सुनिश्चित करने के लिए पाठ्यक्रम व नवीन शैक्षिक सिद्धान्तों का कार्यान्वयन एन0सी0ई0आर0टी0 व सी0बी0एस0ई0 के सहयोग से विगत 50 वर्षों से किया जा रहा है । छात्रों में भारतीयता की भावना का विकास के0वि0सं0 के प्रमुख उद्देश्यों में एक है ।

सी0सी0ई0 के माध्यम से न केवल छात्रों के अकादमिक क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाता है वरन छात्रों के सैद्धान्तिक ज्ञान के व्यावहारिक रूपान्तरण का भी मूल्यांकन किया जाता है । आर0टी0ई0 के अंतर्गत छात्रों को प्रवेश देकर शिक्षा के क्षेत्र में के0वि0सं0 अपने गुरुतर भार का निर्वाह बखूबी करता चला आ रहा है । छात्रों की सृजनात्मकता एवं द्वितीयक कल्पना के संवर्धन में हम सतत प्रयत्नशील हैं ।

मेरा ऐसा मानना है कि हम अपने लक्ष्य में तब ही सफल हो सकेंगे जब हमारा विद्यार्थी विचारवान होगा, वह तार्किक होगा और तब ही वह सही मायने में मानव संसाधन होगा और भारतीय लोकतन्त्र को मज़बूती देगा । हम इन्ही बुनियादी चीज़ों को लेकर काम कर रहे हैं और एन0सी0एफ0 द्वारा विद्यार्थी के स्थानीय ज्ञान-संरचना को स्वीकार करते हैं।

अंततः मैं छात्रों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ । अशेष शुभकामनाओं सहित –

प्राचार्य,

केन्द्रीय विद्यालय रायसेन

Last Updated (Tuesday, 27 December 2016 16:39)

 
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